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mahabharat 3.145.38: महर्षियों द्वारा प्रेमपूर्वक किया गया आतिथ्य शुद्ध हृदय से स्वीकार करके धर्मराज युधिष्ठिर अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥38॥   |   mahabharat अध्याय 3.145: घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष,नर-नारायणाश्रम और गंगाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 145: घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष,नर-नारायणाश्रम और गंगाका वर्णन  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  3.145.38 
स तै: प्रीत्याथ सत्कारमुपनीतं महर्षिभि:।
प्रयत: प्रतिगृह्याथ धर्मराजो युधिष्ठिर:॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
महर्षियों द्वारा प्रेमपूर्वक किया गया आतिथ्य शुद्ध हृदय से स्वीकार करके धर्मराज युधिष्ठिर अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥38॥
 
Having accepted with a pure heart the hospitality lovingly offered by the great sages, Dharmaraja Yudhishthira became very pleased. ॥38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)