श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 145: घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष,नर-नारायणाश्रम और गंगाका वर्णन  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  3.145.29 
बलिहोमार्चितं दिव्यं सुसम्मृष्टानुलेपनम्।
दिव्यपुष्पोपहारैश्च सर्वतोऽभिविराजितम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
वह दिव्य आश्रम पूजा-अर्चना और हवन सामग्री से सुसज्जित था। उसे अच्छी तरह से झाड़ा-बुहारा और लीपा-पोता गया था। चारों ओर से दिव्य पुष्पों की स्तुति उसकी शोभा बढ़ा रही थी।
 
That divine hermitage was decorated with worship and oblations. It was swept and plastered well. Gifts of divine flowers were enhancing its beauty from all sides.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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