श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 145: घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष,नर-नारायणाश्रम और गंगाका वर्णन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.145.28 
महर्षिगणसम्बाधं ब्राह्मॺा लक्ष्म्या समन्वितम्।
दुष्प्रवेशं महाराज नरैर्धर्मबहिष्कृतै:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
महाराज! वह पवित्र तीर्थ महर्षियों के समूह से युक्त और ब्रह्मा के तेज से सुशोभित था। वहाँ अधर्मियों का प्रवेश करना अत्यन्त कठिन था॥ 28॥
 
Maharaj! That holy pilgrimage was full of the group of Maharishis and was adorned with the glory of Brahma. It was very difficult for the irreligious people to enter there.॥ 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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