श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 145: घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष,नर-नारायणाश्रम और गंगाका वर्णन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  3.145.27 
तमसा रहितं पुण्यमनामृष्टं रवे: करै:।
क्षुत्तृट्शीतोष्णदोषैश्च वर्जितं शोकनाशनम्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
जो अंधकार और तमोगुण से रहित तथा गुणों से परिपूर्ण था। (वृक्षों की सघनता के कारण) सूर्य की किरणें उसे स्पर्श नहीं कर सकती थीं। वह आश्रम भूख, प्यास, सर्दी और गर्मी आदि दोषों से रहित तथा समस्त दु:खों का नाश करने वाला था॥ 27॥
 
Which was devoid of darkness and Tamoguna and was full of virtue. (Due to the density of trees) the rays of the sun could not touch it. That ashram was devoid of the defects like hunger, thirst, cold and heat and was the destroyer of all sorrows.॥ 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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