श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 145: घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष,नर-नारायणाश्रम और गंगाका वर्णन  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.145.12 
ते त्वाशुगतिभिर्वीरा राक्षसैस्तैर्महाजवै:।
उह्यमाना ययु: शीघ्रं दीर्घमध्वानमल्पवत्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
उन अत्यंत वेगवान और तीव्र गति से चलने वाले राक्षसों पर सवार होकर वीर पाण्डवों ने उस विशाल मार्ग को इतनी शीघ्रता से पार कर लिया मानो वह बहुत छोटा मार्ग हो ॥12॥
 
Riding on those extremely swift and fast moving demons, the valiant Pandavas covered that huge route as quickly as if it were a very short one. ॥12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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