श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 145: घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष,नर-नारायणाश्रम और गंगाका वर्णन  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.145.11 
एवं सुरमणीयानि वनान्युपवनानि च।
आलोकयन्तस्ते जग्मुर्विशालां बदरीं प्रति॥ ११॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार अत्यंत सुन्दर वन और उपवनों का अवलोकन करते हुए वे सभी विशाल बद्री (बदरिकाश्रम तीर्थ) की ओर चल पड़े।
 
Thus observing the extremely beautiful forests and groves, all of them proceeded towards the huge Badri (Badarikashrama Tirtha).
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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