Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.144.25-28: वैशम्पायनजी कहते हैं - हे राजन! तत्पश्चात धर्मराज की आज्ञा पाकर भीमसेन ने अपने राक्षस पुत्र का स्मरण किया। पिता का स्मरण करते ही धर्मात्मा घटोत्कच हाथ जोड़कर वहाँ उपस्थित हुआ। उस महारथी ने पाण्डवों तथा ब्राह्मणों को प्रणाम किया और उनके द्वारा सम्मानित होकर अपने निर्भय पराक्रमी पिता भीमसेन से कहा - 'महाबाहु! आपने मेरा स्मरण किया है और मैं सेवा की इच्छा से शीघ्र ही आया हूँ, मुझे आज्ञा दीजिए; मैं अवश्य ही आपके समस्त कार्य पूर्ण करूँगा।' यह सुनकर भीमसेन ने राक्षस घटोत्कच को हृदय से लगा लिया। | mahabharat अध्याय 3.144: द्रौपदीकी मूर्छा, पाण्डवोंके उपचारसे उसका सचेत होना तथा भीमसेनके स्मरण करनेपर घटोत्कचका आगमन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
वैशम्पायनजी कहते हैं - हे राजन! तत्पश्चात धर्मराज की आज्ञा पाकर भीमसेन ने अपने राक्षस पुत्र का स्मरण किया। पिता का स्मरण करते ही धर्मात्मा घटोत्कच हाथ जोड़कर वहाँ उपस्थित हुआ। उस महारथी ने पाण्डवों तथा ब्राह्मणों को प्रणाम किया और उनके द्वारा सम्मानित होकर अपने निर्भय पराक्रमी पिता भीमसेन से कहा - 'महाबाहु! आपने मेरा स्मरण किया है और मैं सेवा की इच्छा से शीघ्र ही आया हूँ, मुझे आज्ञा दीजिए; मैं अवश्य ही आपके समस्त कार्य पूर्ण करूँगा।' यह सुनकर भीमसेन ने राक्षस घटोत्कच को हृदय से लगा लिया।
Vaishampayana says - O King! Thereafter, on receiving the order of Dharmaraj, Bhimasena remembered his demon son. On remembering his father, the virtuous Ghatotkacha appeared there with folded hands. That mighty warrior bowed to the Pandavas and the Brahmins and being honoured by them, said to his fearlessly valiant father Bhimasena - 'Mahabahu! You have remembered me and I have come soon with the intention of service, order me; I will certainly complete all your tasks.' On hearing this, Bhimasena embraced the demon Ghatotkacha. 25-28.
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १४४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४४॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥