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mahabharat 3.144.19-20: होश में आने पर पांडवों ने दयनीय तपस्विनी द्रौपदी को पकड़कर मृगचर्म की शय्या पर लिटा दिया और उसे विश्राम दिया। नकुल और सहदेव ने उसके पैरों को, जिनके तलवे लाल थे और जो सुन्दर आकृति से सुशोभित थे, तथा जिनके हाथ धनुष की रगड़ से सुशोभित थे, धीरे से दबाया।   |   mahabharat अध्याय 3.144: द्रौपदीकी मूर्छा, पाण्डवोंके उपचारसे उसका सचेत होना तथा भीमसेनके स्मरण करनेपर घटोत्कचका आगमन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 144: द्रौपदीकी मूर्छा, पाण्डवोंके उपचारसे उसका सचेत होना तथा भीमसेनके स्मरण करनेपर घटोत्कचका आगमन  »  श्लोक 19-20
 
 
श्लोक  3.144.19-20 
परिगृह्य च तां दीनां कृष्णामजिनसंस्तरे।
पार्था विश्रामयामासुर्लब्धसंज्ञां तपस्विनीम्॥ १९॥
तस्या यमौ रक्ततलौ पादौ पूजितलक्षणौ।
कराभ्यां किणजाताभ्यां शनकै: संववाहतु:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
होश में आने पर पांडवों ने दयनीय तपस्विनी द्रौपदी को पकड़कर मृगचर्म की शय्या पर लिटा दिया और उसे विश्राम दिया। नकुल और सहदेव ने उसके पैरों को, जिनके तलवे लाल थे और जो सुन्दर आकृति से सुशोभित थे, तथा जिनके हाथ धनुष की रगड़ से सुशोभित थे, धीरे से दबाया।
 
On regaining consciousness, the Pandavas caught hold of the pitiable ascetic Draupadi and laid her on a bed of deerskin and gave her rest. Nakula and Sahadeva gently pressed her feet, which had red soles and were adorned with fine features, with their hands decorated with the marks of the rubbing of the bow.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)