श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 144: द्रौपदीकी मूर्छा, पाण्डवोंके उपचारसे उसका सचेत होना तथा भीमसेनके स्मरण करनेपर घटोत्कचका आगमन  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  3.144.11 
सुकुमारौ कथं पादौ मुखं च कमलप्रभम्।
मत्कृतेऽद्य वरार्हाया: श्यामतां समुपागतम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
जो द्रौपदी उत्तम सुख के साधन भोगने की अधिकारी है, उसके वे दोनों कोमल चरण और कमल की कान्ति से सुशोभित मुख आज मेरे कारण कैसे काले हो गए?॥11॥
 
How have those two tender feet of Draupadi, who is worthy of enjoying the best means of happiness, and her face adorned with the radiance of the lotus, become black because of me today? ॥11॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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