श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 144: द्रौपदीकी मूर्छा, पाण्डवोंके उपचारसे उसका सचेत होना तथा भीमसेनके स्मरण करनेपर घटोत्कचका आगमन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.144.10 
युधिष्ठिर उवाच
कथं वेश्मसु गुप्तेषु स्वास्तीर्णशयनोचिता।
भूमौ निपतिता शेते सुखार्हा वरवर्णिनी॥ १०॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले, 'अहा! परम सुन्दर कृष्ण, जो सुरक्षित घर में कोमल शय्या पर शयन करने योग्य हैं, आज पृथ्वी पर कैसे सो रहे हैं?'
 
Yudhishthira said, 'Oh! How is the most beautiful Krishna, who is worthy of sleeping on a soft bed in a safe house, sleeping on the earth today?'
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd