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mahabharat 3.144.1-2: वैशम्पायनजी कहते हैं - 'जनमेजय! महाबली पाण्डवों ने अभी एक कोस ही तय किया होगा कि पांचाल राजकुमारी तपस्विनी द्रौपदी अपनी कोमलता के कारण थककर बैठ गई। वह चलने में भी असमर्थ थी। भयंकर आँधी और वर्षा से पीड़ित होकर वह अत्यन्त दुःखी हो गई और मूर्छित होने लगी।॥1-2॥   |   mahabharat अध्याय 3.144: द्रौपदीकी मूर्छा, पाण्डवोंके उपचारसे उसका सचेत होना तथा भीमसेनके स्मरण करनेपर घटोत्कचका आगमन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 144: द्रौपदीकी मूर्छा, पाण्डवोंके उपचारसे उसका सचेत होना तथा भीमसेनके स्मरण करनेपर घटोत्कचका आगमन  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  3.144.1-2 
वैशम्पायन उवाच
क्रोशमात्रं प्रयातेषु पाण्डवेषु महात्मसु।
पद्भॺामनुचिता गन्तुं द्रौपदी समुपाविशत्॥ १॥
श्रान्ता दु:खपरीता च वातवर्षेण तेन च।
सौकुमार्याच्च पाञ्चाली सम्मुमोह तपस्विनी॥ २॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - 'जनमेजय! महाबली पाण्डवों ने अभी एक कोस ही तय किया होगा कि पांचाल राजकुमारी तपस्विनी द्रौपदी अपनी कोमलता के कारण थककर बैठ गई। वह चलने में भी असमर्थ थी। भयंकर आँधी और वर्षा से पीड़ित होकर वह अत्यन्त दुःखी हो गई और मूर्छित होने लगी।॥1-2॥
 
Vaishampayana says, 'Janamejaya! The great Pandavas must have just covered a kos when the Panchala princess, the ascetic Draupadi, got tired and sat down due to her tenderness. She was not at all capable of walking. Suffering from the terrible wind and rain, she was in deep sorrow and was about to faint.॥1-2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)