श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 143: गन्धमादनकी यात्राके समय पाण्डवोंका आँधी-पानीसे सामना  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  3.143.9-10 
न स्म प्रज्ञायते किंचिदावृते व्योम्नि रेणुना।
न चापि शेकुस्तत् कर्तुमन्योन्यस्याभिभाषणम्॥ ९॥
न चापश्यंस्ततोऽन्योन्यं तमसावृतचक्षुष:।
आकृष्यमाणा वातेन साश्मचूर्णेन भारत॥ १०॥
 
 
अनुवाद
आकाश धूल से ढका हुआ था, इसलिए कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था; इसलिए वे आपस में बात भी नहीं कर सकते थे। उनकी आँखों के सामने अन्धकार छा गया था, जिससे पाण्डव एक-दूसरे को देख भी नहीं पा रहे थे। भारत! पत्थरों की धूल उड़ाती हुई वायु उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर खींच रही थी।
 
The sky was covered with dust and so nothing could be seen; that is why they could not even talk to each other. The darkness had covered their eyes; due to which the Pandavas were deprived of even seeing each other. Bhaarat! The wind scattering the dust of stones was pulling them from one place to another. 9-10.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)