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mahabharat 3.143.4-5: उन्होंने ऐसे अनेक स्थान देखे जहाँ सदैव पुष्प और फलों की प्रचुरता रहती थी। उन प्रदेशों में ऋषियों के समुदाय रहते थे। वीर पाण्डव दुर्गम और ऊंचे-ऊंचे स्थानों में फल-मूल खाते हुए, मन को ईश्वर-चिन्तन में लीन रखते हुए विचरण कर रहे थे। मार्ग में उन्हें नाना प्रकार के मृग दिखाई दिए, जिनकी संख्या बहुत अधिक थी॥4-5॥   |   mahabharat अध्याय 3.143: गन्धमादनकी यात्राके समय पाण्डवोंका आँधी-पानीसे सामना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 143: गन्धमादनकी यात्राके समय पाण्डवोंका आँधी-पानीसे सामना  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  3.143.4-5 
नित्यपुष्पफलान् देशान् देवर्षिगणसेवितान्।
आत्मन्यात्मानमाधाय वीरा मूलफलाशिन:॥ ४॥
चेरुरुच्चावचाकारान् देशान् विषमसंकटान्।
पश्यन्तो मृगजातानि बहूनि विविधानि च॥ ५॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने ऐसे अनेक स्थान देखे जहाँ सदैव पुष्प और फलों की प्रचुरता रहती थी। उन प्रदेशों में ऋषियों के समुदाय रहते थे। वीर पाण्डव दुर्गम और ऊंचे-ऊंचे स्थानों में फल-मूल खाते हुए, मन को ईश्वर-चिन्तन में लीन रखते हुए विचरण कर रहे थे। मार्ग में उन्हें नाना प्रकार के मृग दिखाई दिए, जिनकी संख्या बहुत अधिक थी॥4-5॥
 
They saw many such places where there was always abundance of flowers and fruits. In those regions, communities of sages lived. The brave Pandavas were wandering in difficult and up and down places, eating fruits and roots, with their minds immersed in the thought of God. On the way, they saw various types of deer, whose number was very large.॥ 4-5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)