श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 143: गन्धमादनकी यात्राके समय पाण्डवोंका आँधी-पानीसे सामना  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  3.143.22-23 
तस्मिन्नुपरते शब्दे वाते च समतां गते।
गते ह्यम्भसि निम्नानि प्रादुर्भूते दिवाकरे॥ २२॥
निर्जग्मुस्ते शनै: सर्वे समाजग्मुश्च भारत।
प्रतस्थिरे पुनर्वीरा: पर्वतं गन्धमादनम्॥ २३॥
 
 
अनुवाद
भारत! कुछ देर बाद जब आँधी का शोर थम गया, वायु का वेग कम और स्थिर हो गया, पर्वत का सारा जल बह गया और बादलों का आवरण हटने से सूर्य चमक उठा, तब सभी वीर पाण्डव धीरे-धीरे अपने स्थान से निकलकर गंधमादन पर्वत की ओर बढ़े।
 
Bhaarat! After some time when the noise of the storm subsided, the speed of the wind became less and steady, all the water of the mountain flowed down and the Sun shone due to the removal of the cover of the clouds, then all the brave Pandavas slowly came out of their place and proceeded towards the Gandhamadan mountain.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १४३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४३॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)