श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 143: गन्धमादनकी यात्राके समय पाण्डवोंका आँधी-पानीसे सामना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.143.20 
तत्र सागरगा ह्याप: कीर्यमाणा: समन्तत:।
प्रादुरासन् सकलुषा: फेनवत्यो विशाम्पते॥ २०॥
 
 
अनुवाद
महाराज! वहाँ चारों ओर बिखरा हुआ जल समुद्र में बहती नदियों के रूप में प्रतीत हो रहा था, जो कीचड़ से सने होने के कारण गंदी लग रही थीं। उनमें झाग उठ रहा था।
 
Maharaj! The water scattered all around there appeared in the form of rivers flowing in the sea which looked dirty due to the presence of mud. Foam was rising in them.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)