श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 142: पाण्डवोंद्वारा गंगाजीकी वन्दना, लोमशजीका नरकासुरके वध और भगवान् वाराहद्वारा वसुधाके उद्धारकी कथा कहना  »  श्लोक 59-60
 
 
श्लोक  3.142.59-60 
ब्रह्मोवाच
हन्त गच्छत भद्रं वो नन्दने पश्यत स्थितम्।
एषोऽत्र भगवान् श्रीमान् सुपर्ण: सम्प्रकाशते॥ ५९॥
वाराहेणैव रूपेण भगवाँल्लोकभावन:।
कालानल इवाभाति पृथिवीतलमुद्धरन्॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्माजी बोले - देवताओं! यह बड़ी प्रसन्नता की बात है, जाओ। तुम्हारा कल्याण हो। भगवान् नंदनवन में विराजमान हैं। वहाँ उनका दर्शन करो। उस वन के निकट ही परम तेजस्वी जगत-प्रेमी भगवान् श्रीविष्णु, जिनके केश स्वर्ण के समान सुन्दर हैं, वराह रूप में शोभायमान हो रहे हैं। वे पृथ्वी का उद्धार करते हुए प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रकट होते हैं। 59-60॥
 
Brahmaji said – Gods! It is a matter of great pleasure, go. May you be well. Lord is seated in Nandanvan. See him there. Near that forest, the most radiant world-loving Lord Shri Vishnu, having hair as beautiful as gold, is shining in the form of Varaha. While saving the earth, they emerge like the fire of the Doomsday. 59-60॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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