श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 142: पाण्डवोंद्वारा गंगाजीकी वन्दना, लोमशजीका नरकासुरके वध और भगवान् वाराहद्वारा वसुधाके उद्धारकी कथा कहना  »  श्लोक 54-55
 
 
श्लोक  3.142.54-55 
ब्रह्मोवाच
असुरेभ्यो भयं नास्ति युष्माकं कुत्रचित् क्वचित्।
श्रूयतां यत्कृतेष्वेष संक्षोभो जायतेऽमरा:॥ ५४॥
योऽसौ सर्वत्रग: श्रीमानक्षरात्मा व्यवस्थित:।
तस्य प्रभावात् संक्षोभस्त्रिदिवस्य प्रकाशते॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
ब्रह्माजी बोले - "हे देवताओं! आपको दैत्यों से कभी भय नहीं होता। इस सर्वत्र फैले हुए उपद्रव का क्या कारण है? इसे सुनिए। श्रीमन भगवान नारायण के सर्वव्यापी एवं सनातन स्वरूप के प्रभाव से ही स्वर्ग में यह उपद्रव प्रकट हो रहा है ॥ 54-55॥
 
Brahma said, "O Gods! You never have any fear from the demons. What is the reason for this disturbance spreading everywhere? Listen to it. It is due to the influence of the omnipresent and eternal form of Shriman Bhagwan Narayan that this disturbance is appearing in heaven. ॥ 54-55॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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