श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 142: पाण्डवोंद्वारा गंगाजीकी वन्दना, लोमशजीका नरकासुरके वध और भगवान् वाराहद्वारा वसुधाके उद्धारकी कथा कहना  »  श्लोक 49-50
 
 
श्लोक  3.142.49-50 
हाहाभूतमभूत् सर्वं त्रिदिवं व्योम भूस्तथा।
न पर्यवस्थित: कश्चिद् देवो वा मानुषोऽपि वा॥ ४९॥
ततो ब्रह्माणमासीनं ज्वलमानमिव श्रिया।
देवा: सर्षिगणाश्चैव उपतस्थुरनेकश:॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
स्वर्ग, अन्तरिक्ष और पृथ्वी में महान् हलचल मच गई। कोई भी देवता या मनुष्य स्थिर नहीं रह सका। तब अनेक देवता और ऋषिगण ब्रह्माजी के पास गए। उस समय वे अपने आसन पर बैठे हुए दिव्य तेज से प्रकाशित हो रहे थे। 49-50॥
 
There was great commotion in heaven, space and earth. No god or human could remain stable. Then many gods and sages went near Brahmaji. At that time, sitting on his seat, he was illuminated with divine light. 49-50॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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