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श्लोक 3.142.41  |
पृथिव्युवाच
भगवंस्त्वत्प्रसादाद्धि तिष्ठेयं सुचिरं त्विह।
भारेणास्मि समाक्रान्ता न शक्नोमि स्म वर्तितुम्॥ ४१॥ |
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| अनुवाद |
| पृथ्वी बोली - हे प्रभु ! कृपा करके मुझे ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि मैं यहाँ दीर्घकाल तक रह सकूँ । इस समय मैं भार से इतनी दबी हुई हूँ कि प्राण धारण नहीं कर सकती ॥41॥ |
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| The earth said - O Lord! Kindly bless me so that I can stay here for a long time. Right now I am so burdened with the weight that I cannot sustain life. ॥ 41॥ |
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