श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 142: पाण्डवोंद्वारा गंगाजीकी वन्दना, लोमशजीका नरकासुरके वध और भगवान् वाराहद्वारा वसुधाके उद्धारकी कथा कहना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  3.142.41 
पृथिव्युवाच
भगवंस्त्वत्प्रसादाद्धि तिष्ठेयं सुचिरं त्विह।
भारेणास्मि समाक्रान्ता न शक्नोमि स्म वर्तितुम्॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वी बोली - हे प्रभु ! कृपा करके मुझे ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि मैं यहाँ दीर्घकाल तक रह सकूँ । इस समय मैं भार से इतनी दबी हुई हूँ कि प्राण धारण नहीं कर सकती ॥41॥
 
The earth said - O Lord! Kindly bless me so that I can stay here for a long time. Right now I am so burdened with the weight that I cannot sustain life. ॥ 41॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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