श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 142: पाण्डवोंद्वारा गंगाजीकी वन्दना, लोमशजीका नरकासुरके वध और भगवान् वाराहद्वारा वसुधाके उद्धारकी कथा कहना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  3.142.4 
एषा शिवजला पुण्या याति सौम्य महानदी।
बदरीप्रभवा राजन् देवर्षिगणसेविता॥ ४॥
 
 
अनुवाद
हे सौम्य स्वभाव वाले राजा! इस पुण्य रूप में महान नदी अलकनंदा (गंगा) शुभ जल से परिपूर्ण होकर बहती है, जिसकी सेवा देवर्षि समुदाय द्वारा की जाती है। इसका उद्गम बदरिकाश्रम से ही हुआ है। 4॥
 
Gentle natured king! In this virtuous form, the great river Alaknanda (Ganga) flows filled with auspicious water, which is served by the community of Devarshis. It originated from Badarikaashram only. 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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