श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 142: पाण्डवोंद्वारा गंगाजीकी वन्दना, लोमशजीका नरकासुरके वध और भगवान् वाराहद्वारा वसुधाके उद्धारकी कथा कहना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.142.18 
दशवर्षसहस्राणि तपस्तप्यन् महामना:।
ऐन्द्रं प्रार्थयते स्थानं तप:स्वाध्यायविक्रमात्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
वह महामनस्वी दैत्य तप, स्वाध्याय और पराक्रम के द्वारा दस हजार वर्षों तक कठोर तप करके इन्द्र का स्थान लेना चाहता था॥18॥
 
‘That great-minded demon wanted to take the place of Indra by performing rigorous penance for ten thousand years through austerity, self-study and valour.॥ 18॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas