श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 142: पाण्डवोंद्वारा गंगाजीकी वन्दना, लोमशजीका नरकासुरके वध और भगवान् वाराहद्वारा वसुधाके उद्धारकी कथा कहना  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  3.142.15-16 
एतद् विकीर्णं सुश्रीमत् कैलासशिखरोपमम्।
यत् पश्यसि नरश्रेष्ठ पर्वतप्रतिमं स्थितम्॥ १५॥
एतान्यस्थीनि दैत्यस्य नरकस्य महात्मन:।
पर्वतप्रतिमं भाति पर्वतप्रस्तराश्रितम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषश्रेष्ठ! आप जो कैलाश शिखर के समान सुन्दर, प्रकाशमान पर्वताकार वस्तुएँ चारों ओर बिखरी हुई देख रहे हैं, वे सब महाबली राक्षस नरकासुर की हड्डियाँ हैं। ये भी पर्वतों और शिलाओं पर स्थित होने के कारण पर्वतों के समान प्रतीत होती हैं॥ 15-16॥
 
‘O best of men! The beautiful, luminous mountain-like objects like the Kailash peak that you are seeing scattered all around are all the bones of the gigantic demon Narakasura. Being situated on mountains and rocks, these too appear like mountains.॥ 15-16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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