श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 142: पाण्डवोंद्वारा गंगाजीकी वन्दना, लोमशजीका नरकासुरके वध और भगवान् वाराहद्वारा वसुधाके उद्धारकी कथा कहना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.142.1 
लोमश उवाच
द्रष्टार: पर्वता: सर्वे नद्य: सपुरकानना:।
तीर्थानि चैव श्रीमन्ति स्पृष्टं च सलिलं करै:॥ १॥
 
 
अनुवाद
लोमशजी बोले - हे तीर्थराज पाण्डुकुमार! तुमने सम्पूर्ण पर्वतों को देखा है। नगरों और वनों के साथ नदियों को भी देखा है। सुन्दर तीर्थों को भी देखा है और उन सबके जल का अपने हाथों से स्पर्श भी किया है॥1॥
 
Lomashji said - O pilgrim Pandukumar! You have seen all the mountains. You have also seen the rivers along with the cities and forests. You have also seen the beautiful pilgrimage places and have even touched the water of all of them with your hands.॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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