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mahabharat 3.140.6-7: मैं, नकुल और महातपस्वी लोमशजी - ये तीनों ही संयम और उपवास का पालन करते हुए यहाँ से आगे की यात्रा करेंगे। हम तीनों अल्पाहार पर निर्वाह करेंगे। तुम गंगाद्वार (हरिद्वार) में मेरे आगमन की एकाग्रचित्त होकर प्रतीक्षा करना और मेरे लौटने तक द्रौपदी की रक्षा करते हुए वहीं रहना। 6-7.   |   mahabharat अध्याय 3.140: भीमसेनका उत्साह तथा पाण्डवोंका कुलिन्दराज सुबाहुके राज्यमें होते हुए गन्धमादन और हिमालय पर्वतको प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 140: भीमसेनका उत्साह तथा पाण्डवोंका कुलिन्दराज सुबाहुके राज्यमें होते हुए गन्धमादन और हिमालय पर्वतको प्रस्थान  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  3.140.6-7 
त्रयो वयं गमिष्यामो लघ्वाहारा यतव्रता:।
अहं च नकुलश्चैव लोमशश्च महातपा:॥ ६॥
ममागमनमाकाङ्क्षन् गङ्गाद्वारे समाहित:।
वसेह द्रौपदीं रक्षन् यावदागमनं मम॥ ७॥
 
 
अनुवाद
मैं, नकुल और महातपस्वी लोमशजी - ये तीनों ही संयम और उपवास का पालन करते हुए यहाँ से आगे की यात्रा करेंगे। हम तीनों अल्पाहार पर निर्वाह करेंगे। तुम गंगाद्वार (हरिद्वार) में मेरे आगमन की एकाग्रचित्त होकर प्रतीक्षा करना और मेरे लौटने तक द्रौपदी की रक्षा करते हुए वहीं रहना। 6-7.
 
Only I, Nakul and the great ascetic Lomashji - these three persons will travel further from here, observing restraint and fasting. All three of us will survive on light food. You wait for my arrival at Gangadwar (Haridwar) with concentration and stay there, protecting Draupadi, until I return. 6-7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)