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mahabharat 3.140.27-29: अगले दिन सूर्योदय के पश्चात्, स्वच्छ प्रातःकाल में, वे सभी हिमालय की ओर चल पड़े। हे जनमेजय! इंद्रसेन आदि सेवकों, रसोइयों, रसोई के प्रधान तथा द्रौपदी का सारा सामान कुलिंदराज सुबाहु, महारथी और कुरुवंशी पुत्र को सौंपकर, पांडव द्रौपदी के साथ धीरे-धीरे पैदल चल पड़े। वे अर्जुन के दर्शन के लिए अत्यंत उत्सुक थे। अतः उन्होंने बड़े हर्ष और उल्लास के साथ उस देश को प्रस्थान किया।   |   mahabharat अध्याय 3.140: भीमसेनका उत्साह तथा पाण्डवोंका कुलिन्दराज सुबाहुके राज्यमें होते हुए गन्धमादन और हिमालय पर्वतको प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 140: भीमसेनका उत्साह तथा पाण्डवोंका कुलिन्दराज सुबाहुके राज्यमें होते हुए गन्धमादन और हिमालय पर्वतको प्रस्थान  »  श्लोक 27-29
 
 
श्लोक  3.140.27-29 
प्रतस्थुर्विमले सूर्ये हिमवन्तं गिरिं प्रति।
इन्द्रसेनमुखांश्चापि भृत्यान् पौरोगवांस्तथा॥ २७॥
सूदांश्च पारिबर्हांश्च द्रौपद्या: सर्वशो नृप।
राज्ञ: कुलिन्दाधिपते: परिदाय महारथा:॥ २८॥
पद्भिरेव महावीर्या ययु: कौरवनन्दना:।
ते शनै: प्राद्रवन् सर्वे कृष्णया सह पाण्डवा:।
तस्माद् देशात् सुसंहृष्टा द्रष्टुकामा धनंजयम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
अगले दिन सूर्योदय के पश्चात्, स्वच्छ प्रातःकाल में, वे सभी हिमालय की ओर चल पड़े। हे जनमेजय! इंद्रसेन आदि सेवकों, रसोइयों, रसोई के प्रधान तथा द्रौपदी का सारा सामान कुलिंदराज सुबाहु, महारथी और कुरुवंशी पुत्र को सौंपकर, पांडव द्रौपदी के साथ धीरे-धीरे पैदल चल पड़े। वे अर्जुन के दर्शन के लिए अत्यंत उत्सुक थे। अतः उन्होंने बड़े हर्ष और उल्लास के साथ उस देश को प्रस्थान किया।
 
The next day, after sunrise, in the clear morning, they all left for the Himalayas. O Janamejaya! After handing over the servants like Indrasen, the cooks and the head of the kitchen and all the belongings of Draupadi to the King of the Kulindas, Subahu, the mighty warriors and the son of the Kuru clan, the Pandavas slowly set out on foot with Draupadi. They were very eager to see Arjun. Therefore, they left that country with great joy and happiness.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गन्धमादनप्रवेशे चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १४०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें गन्धमादनप्रवेशविषयक एक सौ चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४०॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)