श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 140: भीमसेनका उत्साह तथा पाण्डवोंका कुलिन्दराज सुबाहुके राज्यमें होते हुए गन्धमादन और हिमालय पर्वतको प्रस्थान  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.140.2 
संनिवर्तय कौन्तेय क्षुत्पिपासे बलाश्रयात्।
ततो बलं च दाक्ष्यं च संश्रयस्व वृकोदर॥ २॥
 
 
अनुवाद
वृकोदर! तुम बल का सहारा लेकर अपनी भूख-प्यास मिटा सकते हो। फिर शारीरिक बल और चतुराई का सहारा लो॥2॥
 
Vrikodara! You can quench your hunger and thirst by taking the help of strength. Then take the help of physical strength and cleverness.॥2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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