श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 140: भीमसेनका उत्साह तथा पाण्डवोंका कुलिन्दराज सुबाहुके राज्यमें होते हुए गन्धमादन और हिमालय पर्वतको प्रस्थान  »  श्लोक 18-20
 
 
श्लोक  3.140.18-20 
युधिष्ठिर उवाच
एवं ते भाषमाणस्य बलं भीमाभिवर्धताम्।
यत् त्वमुत्सहसे वोढुं पाञ्चालीं च यशस्विनीम्॥ १८॥
यमजौ चापि भद्रं ते नैतदन्यत्र विद्यते।
बलं तव यशश्चैव धर्म: कीर्तिश्च वर्धताम्॥ १९॥
यत् त्वमुत्सहसे नेतुं भ्रातरौ सह कृष्णया।
मा ते ग्लानिर्महाबाहो मा च तेऽस्तु पराभव:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले, "भीमसेन! इस प्रकार बोलने से तुम्हारा बल बढ़े, क्योंकि तुम यशस्वी द्रौपदी तथा नकुल-सहदेव को भी ले जाने के लिए उत्साहित हो। तुम समृद्ध होओ। तुम्हारे अतिरिक्त अन्य किसी में ऐसा साहस नहीं है। तुम्हारा बल, यश, धर्म और कीर्ति बढ़े। महाबाहो! तुममें द्रौपदी तथा अपने दोनों भाइयों नकुल-सहदेव को अकेले ले जाने की शक्ति है, इसलिए तुम्हें कभी लज्जा न आए और न ही किसी के द्वारा तुम्हारा अपमान हो।" 18-20
 
Yudhishthira said, "Bhimasena! May your strength increase by speaking in this manner, because you are enthusiastic about carrying the famous Draupadi and Nakula-Sahadeva as well. May you prosper. No one else has this courage except you. May your strength, fame, Dharma and reputation increase. Mahabaho! You have the power to carry Draupadi as well as your two brothers Nakula-Sahadeva by yourself, so may you never feel ashamed and may you never be insulted by anyone." 18-20
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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