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mahabharat 3.138.17: उसके इतना कहने पर भी राजा के सेवकों ने क्रोधपूर्वक उसे डाँटा। तब वह महातपस्वी ऋषि चुपचाप वन में चले गए।   |   mahabharat अध्याय 3.138: अर्वावसुकी तपस्याके प्रभावसे परावसुका ब्रह्महत्यासे मुक्त होना और रैभ्य,भरद्वाज तथा यवक्रीत आदिका पुनर्जीवित होना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 138: अर्वावसुकी तपस्याके प्रभावसे परावसुका ब्रह्महत्यासे मुक्त होना और रैभ्य,भरद्वाज तथा यवक्रीत आदिका पुनर्जीवित होना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.138.17 
स तथा प्रवदन् क्रोधात् तैश्च प्रेष्यै: प्रभाषित:।
तूष्णीं जगाम ब्रह्मर्षिर्वनमेव महातपा:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
उसके इतना कहने पर भी राजा के सेवकों ने क्रोधपूर्वक उसे डाँटा। तब वह महातपस्वी ऋषि चुपचाप वन में चले गए।
 
Even after he said this, the king's servants angrily rebuked him. Then the great ascetic sage quietly went to the forest.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)