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श्लोक 3.137.1-2  |
लोमश उवाच
भरद्वाजस्तु कौन्तेय कृत्वा स्वाध्यायमाह्निकम्।
समित्कलापमादाय प्रविवेश स्वमाश्रमम्॥ १॥
तं स्म दृष्ट्वा पुरा सर्वे प्रत्युत्तिष्ठन्ति पावका:।
न त्वेनमुपतिष्ठन्ति हतपुत्रं तदाग्नय:॥ २॥ |
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| अनुवाद |
| लोमशजी कहते हैं- कुन्तीनंदन! भारद्वाज मुनि नित्यकर्म से निवृत्त होकर बहुत-सी लकड़ियाँ लेकर आश्रम में आए। उस दिन से पहले उन्हें देखकर सभी अग्नियाँ उठकर उनका स्वागत करती थीं, किन्तु उस समय उनका पुत्र मारा गया था, अतः अशुद्ध होने के कारण अग्नियाँ पहले की तरह उठकर उनका स्वागत नहीं कर सकीं॥ 12॥ |
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| Lomashji says- Kunti Nandan! Bharadwaj Muni came to the ashram after completing his daily studies with lots of firewood. Before that day all the fires used to stand up and welcome him on seeing him, but at that time his son had been killed, so being impure the fires did not stand up and welcome him as before.॥ 12॥ |
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