श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 136: यवक्रीतका रैभ्यमुनिकी पुत्रवधूके साथ व्यभिचार और रैभ्यमुनिके क्रोधसे उत्पन्न राक्षसके द्वारा उसकी मृत्यु  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  3.136.6-7 
रुदतीं च स्नुषां दृष्ट्वा भार्यामार्तां परावसो:।
सान्त्वयन् श्लक्ष्णया वाचा पर्यपृच्छद् युधिष्ठिर॥ ६॥
सा तस्मै सर्वमाचष्ट यवक्रीभाषितं शुभा।
प्रत्युक्तं च यवक्रीतं प्रेक्षापूर्वं तथाऽऽत्मना॥ ७॥
 
 
अनुवाद
वापस आकर उसने देखा कि उसकी पुत्रवधू और परावसु की पत्नी दुःख से विलाप कर रही हैं। युधिष्ठिर! यह देखकर रैभ्य ने मधुर वचनों से उसे सांत्वना दी और उसके रोने का कारण पूछा। उस धर्मपरायण पुत्रवधू ने यवक्रीत द्वारा कही गई सारी बातें अपने श्वसुर को बता दीं और यह भी बताया कि उसने स्वयं क्यों अच्छी तरह सोच-विचार कर यवक्रीत की बात मानने से इनकार कर दिया था।
 
On coming back he saw that his daughter-in-law and wife of Paravasu were weeping in anguish. Yudhishthira! On seeing this Raibhya consoled her with sweet words and asked the reason for her weeping. That virtuous daughter-in-law told everything that Yavakrit had said to her father-in-law and also told him the entire incident of why she herself had refused to accept Yavakrit's words after thinking over it well.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)