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mahabharat 3.135.60: लोमशजी कहते हैं- युधिष्ठिर! पिता से ये मधुर वचन कहकर यवक्रीत निर्भय होकर विचरण करने लगा। उसे अन्य ऋषियों को कष्ट देने में अधिक आनन्द मिलता था। ऐसा करके वह अत्यन्त संतुष्ट रहता था।   |   mahabharat अध्याय 3.135: कर्दमिलक्षेत्र आदि तीर्थोंकी महिमा, रैभ्य एवं भरद्वाजपुत्र यवक्रीत मुनिकी कथा तथा ऋषियोंका अनिष्ट करनेके कारण मेधावीकी मृत्यु   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 135: कर्दमिलक्षेत्र आदि तीर्थोंकी महिमा, रैभ्य एवं भरद्वाजपुत्र यवक्रीत मुनिकी कथा तथा ऋषियोंका अनिष्ट करनेके कारण मेधावीकी मृत्यु  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  3.135.60 
लोमश उवाच
उक्त्वा स पितरं श्लक्ष्णं यवक्रीरकुतोभय:।
विप्रकुर्वनृषीनन्यानतुष्यत् परया मुदा॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
लोमशजी कहते हैं- युधिष्ठिर! पिता से ये मधुर वचन कहकर यवक्रीत निर्भय होकर विचरण करने लगा। उसे अन्य ऋषियों को कष्ट देने में अधिक आनन्द मिलता था। ऐसा करके वह अत्यन्त संतुष्ट रहता था।
 
Lomashaji says- Yudhishthira! After saying these sweet words to his father, Yavkrit started moving around fearlessly. He got more pleasure in tormenting other sages. He remained very satisfied by doing so. 60.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां यवक्रीतोपाख्याने पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १३५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें यवक्रीतोपाख्यानविषयक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३५॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)