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mahabharat 3.135.56: इस प्रकार वरदान पाकर तपस्वी बालक अभिमान से भर जाते हैं और (अपने कुकर्मों के कारण) शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। मैं तुम्हें सावधान करता हूँ, ताकि तुम्हारी भी यही दशा न हो॥ 56॥   |   mahabharat अध्याय 3.135: कर्दमिलक्षेत्र आदि तीर्थोंकी महिमा, रैभ्य एवं भरद्वाजपुत्र यवक्रीत मुनिकी कथा तथा ऋषियोंका अनिष्ट करनेके कारण मेधावीकी मृत्यु   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 135: कर्दमिलक्षेत्र आदि तीर्थोंकी महिमा, रैभ्य एवं भरद्वाजपुत्र यवक्रीत मुनिकी कथा तथा ऋषियोंका अनिष्ट करनेके कारण मेधावीकी मृत्यु  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  3.135.56 
एवं लब्ध्वा वरान् बाला दर्पपूर्णास्तपस्विन:।
क्षिप्रमेव विनश्यन्ति यथा न स्यात् तथा भवान्॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार वरदान पाकर तपस्वी बालक अभिमान से भर जाते हैं और (अपने कुकर्मों के कारण) शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। मैं तुम्हें सावधान करता हूँ, ताकि तुम्हारी भी यही दशा न हो॥ 56॥
 
In this manner, on getting a boon, ascetic children become filled with pride and (due to their misbehaviour) soon perish. I caution you so that the same fate does not befall you.॥ 56॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)