Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.135.41-42: लोमशजी कहते हैं - हे राजन! तब इन्द्र ने महातपस्वी यवक्रीत को उसकी इच्छानुसार वरदान देते हुए कहा - 'यवक्रीत! तुम्हें अपने पिता के साथ-साथ वेदों का भी पर्याप्त ज्ञान प्राप्त होगा। साथ ही तुम्हारी जो अन्य इच्छाएँ हैं, वे भी पूर्ण होंगी। अब तुम तपस्या छोड़कर अपने आश्रम को लौट जाओ।' इस प्रकार पूर्णतः संतुष्ट होकर यवक्रीत अपने पिता के पास गया और इस प्रकार बोला। | mahabharat अध्याय 3.135: कर्दमिलक्षेत्र आदि तीर्थोंकी महिमा, रैभ्य एवं भरद्वाजपुत्र यवक्रीत मुनिकी कथा तथा ऋषियोंका अनिष्ट करनेके कारण मेधावीकी मृत्यु । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
लोमशजी कहते हैं - हे राजन! तब इन्द्र ने महातपस्वी यवक्रीत को उसकी इच्छानुसार वरदान देते हुए कहा - 'यवक्रीत! तुम्हें अपने पिता के साथ-साथ वेदों का भी पर्याप्त ज्ञान प्राप्त होगा। साथ ही तुम्हारी जो अन्य इच्छाएँ हैं, वे भी पूर्ण होंगी। अब तुम तपस्या छोड़कर अपने आश्रम को लौट जाओ।' इस प्रकार पूर्णतः संतुष्ट होकर यवक्रीत अपने पिता के पास गया और इस प्रकार बोला।
Lomashaji says - O King! Then Indra granted a boon to the great ascetic Yavakrit as per his wish and said - 'Yavakrit! You will get sufficient knowledge of the Vedas along with your father. Along with that, whatever other desire you have will also be fulfilled. Now you should leave the penance and return to your hermitage.' Having thus become completely satisfied, Yavakrit went to his father and spoke thus.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥