श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 134: बन्दी और अष्टावक्रका शास्त्रार्थ, बन्दीकी पराजय तथा समङ्गामें स्नानसे अष्टावक्रके अंगोंका सीधा होना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  3.134.9 
अष्टावक्र उवाच
द्वाविन्द्राग्नी चरतो वै सखायौ
द्वौ देवर्षी नारदपर्वतौ च।
द्वावश्विनौ द्वे रथस्यापि चक्रे
भार्यापती द्वौ विहितौ विधात्रा॥ ९॥
 
 
अनुवाद
अष्टावक्र बोले - जो दो देवता सदैव दो मित्रों की भाँति साथ-साथ विचरण करते हैं, वे हैं इन्द्र और अग्नि। केवल दो ही देवता हैं - नारद मुनि और पर्वत - जो परस्पर मित्र हैं। अश्विनीकुमार भी दो ही हैं, रथ के भी दो ही पहिए हैं और विधाता ने भी दो ही पति-पत्नी बनाए हैं॥9॥
 
Ashtavakra said - The two gods who always move about together like two friends are Indra and Agni. There are only two gods - sage Narada and Parvat - who are friends with each other. There are only two Ashwinikumars, there are only two wheels in a chariot and the creator has made only two husbands and wives.॥9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)