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mahabharat 3.134.30: अष्टावक्र बोले- महाराज! मुझे इस बंदी के जीवित रहने में कोई रुचि नहीं है। यदि इसके पिता वरुणदेव हैं, तो उनके पास जाने के लिए इसे अवश्य ही जलाशय में डुबो दीजिए। 30॥   |   mahabharat अध्याय 3.134: बन्दी और अष्टावक्रका शास्त्रार्थ, बन्दीकी पराजय तथा समङ्गामें स्नानसे अष्टावक्रके अंगोंका सीधा होना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 134: बन्दी और अष्टावक्रका शास्त्रार्थ, बन्दीकी पराजय तथा समङ्गामें स्नानसे अष्टावक्रके अंगोंका सीधा होना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.134.30 
अष्टावक्र उवाच
नानेन जीवता कश्चिदर्थो मे बन्दिना नृप।
पिता यद्यस्य वरुणो मज्जयैनं जलाशये॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
अष्टावक्र बोले- महाराज! मुझे इस बंदी के जीवित रहने में कोई रुचि नहीं है। यदि इसके पिता वरुणदेव हैं, तो उनके पास जाने के लिए इसे अवश्य ही जलाशय में डुबो दीजिए। 30॥
 
Ashtavakra said – Maharaj! I have no interest in this prisoner's survival. If his father is Varundev, then to go to him, definitely drown him in the reservoir. 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)