श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 134: बन्दी और अष्टावक्रका शास्त्रार्थ, बन्दीकी पराजय तथा समङ्गामें स्नानसे अष्टावक्रके अंगोंका सीधा होना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  3.134.29 
जनक उवाच
शृणोमि वाचं तव दिव्यरूपा-
ममानुषीं दिव्यरूपोऽसि साक्षात्।
अजैषीर्यद् बन्दिनं त्वं विवादे
निसृष्ट एष तव कामोऽद्य बन्दी॥ २९॥
 
 
अनुवाद
जनक बोले, "हे ब्रह्मन्! मैं आपकी दिव्य एवं अलौकिक वाणी सुन रहा हूँ। आप देवत्व के साक्षात स्वरूप हैं। आपने बंदी को शास्त्रार्थ में पराजित किया है। अब आपकी इच्छा पूर्ण हो रही है। देखिए, यह वही बंदी है जिसे आपने जीत लिया है।"
 
Janaka said, "O Brahman! I am listening to your divine and supernatural voice. You are the embodiment of divinity. You have defeated the prisoner in a debate. Your wish is being fulfilled now. See, this is the prisoner you have conquered."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)