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mahabharat 3.134.12: सेवक बोला - यज्ञ की अग्नि गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय, सिकण्ड्य और अवस्थ्य नामक पाँच प्रकार की कही गई है। पंक्ति 6, श्लोक भी पाँच पादों से बना है, यज्ञ पाँच ही हैं - देवयज्ञ, पितृयज्ञ, ऋषियज्ञ, भूतयज्ञ और मनुष्ययज्ञ। इसी प्रकार इन्द्रियों की संख्या भी पाँच है। वेदों में पंचवेणीवाली (पंच 8 चूड़ा) अप्सरा का वर्णन देखा गया है और पंचनद क्षेत्र पाँच और नौ नदियों से युक्त होने के कारण लोगों में प्रसिद्ध है। 12॥   |   mahabharat अध्याय 3.134: बन्दी और अष्टावक्रका शास्त्रार्थ, बन्दीकी पराजय तथा समङ्गामें स्नानसे अष्टावक्रके अंगोंका सीधा होना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 134: बन्दी और अष्टावक्रका शास्त्रार्थ, बन्दीकी पराजय तथा समङ्गामें स्नानसे अष्टावक्रके अंगोंका सीधा होना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.134.12 
बन्द्युवाच
पञ्चाग्नय: पञ्चपदा च पङ्क्ति-
र्यज्ञा: पञ्चैवाप्यथ पञ्चेन्द्रियाणि।
दृष्टा वेदे पञ्चचूडाप्सराश्च
लोके ख्यातं पञ्चनदं च पुण्यम्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
सेवक बोला - यज्ञ की अग्नि गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय, सिकण्ड्य और अवस्थ्य नामक पाँच प्रकार की कही गई है। पंक्ति 6, श्लोक भी पाँच पादों से बना है, यज्ञ पाँच ही हैं - देवयज्ञ, पितृयज्ञ, ऋषियज्ञ, भूतयज्ञ और मनुष्ययज्ञ। इसी प्रकार इन्द्रियों की संख्या भी पाँच है। वेदों में पंचवेणीवाली (पंच 8 चूड़ा) अप्सरा का वर्णन देखा गया है और पंचनद क्षेत्र पाँच और नौ नदियों से युक्त होने के कारण लोगों में प्रसिद्ध है। 12॥
 
The servant said – The fire of Yagya is said to be of five types namely Garhapatya, Dakshinagni, Ahavaniya, Sikandya and Awasthya. Line 6, the verse is also made up of five padas, there are only five yagyas – Devyajya, Pitriyayajya, Rishiyajya, Bhootyayajya and Manushyayajya. Similarly, the number of senses is also five. The description of the five-veniwali (Panch 8 Chuda) Apsara has been seen in the Vedas and Panchnad region is famous among the people for being blessed with five and nine rivers. 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)