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mahabharat 3.133.8: द्वारपाल ने कहा, "ब्राह्मणपुत्र! तुम्हें वेदों द्वारा प्रतिपादित उन सुन्दर वचनों का उच्चारण करना चाहिए, जो उस एकाक्षर ब्रह्म का ज्ञान कराने वाले हैं, जिसके अनेक रूप हैं और अपने को बालक समझकर अपनी बड़ाई क्यों करते हो? इस संसार में बुद्धिमान पुरुष दुर्लभ हैं।"   |   mahabharat अध्याय 3.133: अष्टावक्रका द्वारपाल तथा राजा जनकसे वार्तालाप   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 133: अष्टावक्रका द्वारपाल तथा राजा जनकसे वार्तालाप  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.133.8 
द्वारपाल उवाच
सरस्वतीमीरय वेदजुष्टा-
मेकाक्षरां बहुरूपां विराजम्।
अङ्गात्मानं समवेक्षस्व बालं
किं श्लाघसे दुर्लभो वै मनीषी॥ ८॥
 
 
अनुवाद
द्वारपाल ने कहा, "ब्राह्मणपुत्र! तुम्हें वेदों द्वारा प्रतिपादित उन सुन्दर वचनों का उच्चारण करना चाहिए, जो उस एकाक्षर ब्रह्म का ज्ञान कराने वाले हैं, जिसके अनेक रूप हैं और अपने को बालक समझकर अपनी बड़ाई क्यों करते हो? इस संसार में बुद्धिमान पुरुष दुर्लभ हैं।"
 
The gatekeeper said, "Brahmin's son! You should utter the beautiful words propounded by the Vedas, which impart knowledge of the one syllable Brahman, which has many forms and consider yourself a child. Why do you praise yourself? Wise men are rare in this world.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)