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mahabharat 3.133.7: इसके अतिरिक्त, हम अपने बड़ों के सेवक हैं, अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हैं और शास्त्रों के अच्छे ज्ञाता हैं। केवल बालक होने के कारण ब्राह्मण का अपमान करना उचित नहीं है; क्योंकि अग्नि की एक छोटी सी चिंगारी भी किसी व्यक्ति को छू जाने पर उसे जला सकती है। 7.   |   mahabharat अध्याय 3.133: अष्टावक्रका द्वारपाल तथा राजा जनकसे वार्तालाप   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 133: अष्टावक्रका द्वारपाल तथा राजा जनकसे वार्तालाप  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.133.7 
शुश्रूषवश्चापि जितेन्द्रियाश्च
ज्ञानागमे चापि गता: स्म निष्ठाम्।
न बाल इत्यवमन्तव्यमाहु-
र्बालोऽप्यग्निर्दहति स्पृश्यमान:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
इसके अतिरिक्त, हम अपने बड़ों के सेवक हैं, अपनी इन्द्रियों को वश में रखते हैं और शास्त्रों के अच्छे ज्ञाता हैं। केवल बालक होने के कारण ब्राह्मण का अपमान करना उचित नहीं है; क्योंकि अग्नि की एक छोटी सी चिंगारी भी किसी व्यक्ति को छू जाने पर उसे जला सकती है। 7.
 
Besides, we are servants of our elders, have controlled our senses and are well versed in the scriptures. It is not right to insult a Brahmin just because he is a child; because even a small spark of fire can burn a person if it touches him. 7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)