|
| |
| |
श्लोक 3.133.30  |
राजोवाच
न त्वां मन्ये मानुषं देवसत्त्वं
न त्वं बाल: स्थविर: सम्मतो मे।
न ते तुल्यो विद्यते वाक्प्रलापे
तस्मात् द्वारं वितराम्येष बन्दी॥ ३०॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| राजा ने कहा - ब्रह्मन् ! तुम्हारा बल देवताओं के समान है, मैं तुम्हें मनुष्य नहीं मानता; तुम बालक भी नहीं हो। मैं तुम्हें वृद्ध मानता हूँ। शास्त्रार्थ करने में तुम्हारे समान कोई नहीं है, इसलिए मैं तुम्हें यज्ञमण्डप में प्रवेश का द्वार देता हूँ। ये वे बन्दी हैं (जिनसे तुम मिलना चाहते थे)॥30॥ |
| |
| The king said - Brahman! Your power is equal to that of the gods, I do not consider you a human being; you are not even a child. I consider you an old man. There is no one like you in debating, hence I give you the door to enter the Yagya Mandap. These are the prisoners (whom you wanted to meet).॥ 30॥ |
| |
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामष्टावक्रीये त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १३३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अष्टावक्रीयोपाख्यानविषयक एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३३॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३१ श्लोक हैं) |
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|