श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 133: अष्टावक्रका द्वारपाल तथा राजा जनकसे वार्तालाप  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  3.133.27 
अष्टावक्र उवाच
मा स्म ते ते गृहे राजञ्छात्रवाणामपि ध्रुवम्।
वातसारथिरागन्ता गर्भं सुषुवतुश्च तम्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
अष्टावक्र बोले - राजन ! ये दोनों आपके शत्रुओं के घर पर भी कभी न गिरें। वायुदेव जिनके सारथी हैं, वे ही मेघरूपी देवता इन दोनों के गर्भ को धारण करेंगे और ये दोनों उस मेघरूपी गर्भ को जन्म देने वाले हैं॥27॥
 
Ashtavakra said – King! May both of them never fall even on the house of your enemies. The cloud-like god whose charioteer is Vayu is the one who will bear the womb of these two and both of them are going to give birth to that cloud-like womb*॥ 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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