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mahabharat 3.133.22: हे प्रिय! अनेक ज्ञानी ब्राह्मण बंदी को जीतने की इच्छा से आये हैं और शास्त्रार्थ की घोषणा भी की है, किन्तु उसके निकट पहुँचते ही उनका प्रभाव नष्ट हो गया। इतना ही नहीं, वे पराजित और तिरस्कृत होकर चुपचाप राजसभा से चले गए हैं। फिर वे अन्य सदस्यों से बातचीत भी कैसे कर सकते हैं? 22.   |   mahabharat अध्याय 3.133: अष्टावक्रका द्वारपाल तथा राजा जनकसे वार्तालाप   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 133: अष्टावक्रका द्वारपाल तथा राजा जनकसे वार्तालाप  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.133.22 
आशंसन्तो बन्दिनं जेतुकामा-
स्तस्यान्तिकं प्राप्य विलुप्तशोभा:।
विज्ञानमत्ता नि:सृताश्चैव तात
कथं सदस्यैर्वचनं विस्तरेयु:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
हे प्रिय! अनेक ज्ञानी ब्राह्मण बंदी को जीतने की इच्छा से आये हैं और शास्त्रार्थ की घोषणा भी की है, किन्तु उसके निकट पहुँचते ही उनका प्रभाव नष्ट हो गया। इतना ही नहीं, वे पराजित और तिरस्कृत होकर चुपचाप राजसभा से चले गए हैं। फिर वे अन्य सदस्यों से बातचीत भी कैसे कर सकते हैं? 22.
 
O dear! Many Brahmins full of knowledge have come with the desire to win over the prisoner and have announced a debate, but as soon as they reached near him, their effect was destroyed. Not only this, they have quietly left the royal court, defeated and despised. Then how can they even talk to other members? 22.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)