श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 133: अष्टावक्रका द्वारपाल तथा राजा जनकसे वार्तालाप  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.133.17 
अष्टावक्र उवाच
भो भो राजञ्जनकानां वरिष्ठ
त्वं वै सम्राट् त्वयि सर्वं समृद्धम्।
त्वं वा कर्ता कर्मणां यज्ञियानां
ययातिरेको नृपतिर्वा पुरस्तात्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
अष्टावक्र बोले, "हे राजन! आप जनककुल में श्रेष्ठ पुरुष हैं, सम्राट हैं। आपके पास सब प्रकार के ऐश्वर्य हैं। इस समय आप ही श्रेष्ठ यज्ञ करने वाले हैं; अथवा पूर्वकाल में केवल राजा ययाति ही ऐसे हुए हैं ॥17॥
 
Ashtavakra said, "O King! You are the best man of the Janaka clan, you are the emperor. You have all kinds of opulences. At present, you are the only one who performs the best yajnas (sacrifices); or in the past, only king Yayati has been like this. ॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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