श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 132: अष्टावक्रके जन्मका वृत्तान्त और उनका राजा जनकके दरबारमें जाना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  3.132.23 
तौ जग्मतुर्मातुलभागिनेयौ
यज्ञं समृद्धं जनकस्य राज्ञ:।
अष्टावक्र: पथि राज्ञा समेत्य
प्रोत्सार्यमाणो वाक्यमिदं जगाद॥ २३॥
 
 
अनुवाद
ऐसा निश्चय करके वे दोनों चाचा-भतीजे राजा जनक के सुयशपूर्ण यज्ञ में गए। यज्ञमंडप के मार्ग में अष्टावक्र राजा से मिले। उस समय राजसेवकों ने उन्हें मार्ग से हटाने का प्रयत्न किया, तब उन्होंने इस प्रकार कहा॥23॥
 
Having decided this, both the uncle and nephew went to the prosperous Yagya of King Janaka. Ashtavakra met the king on the way to the Yagya Mandap. At that time, the royal servants tried to push him away from the way, then he spoke thus.॥23॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामष्टावक्रीये द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १३२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अष्टावक्रीयोपाख्यानविषयक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३२॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)