श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 13: श्रीकृष्णका जूएके दोष बताते हुए पाण्डवोंपर आयी हुई विपत्तिमें अपनी अनुपस्थितिको कारण मानना  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  3.13.7-8 
स्त्रियोऽक्षा मृगया पानमेतत् कामसमुत्थितम्।
दु:खं चतुष्टयं प्रोक्तं यैर्नरो भ्रश्यते श्रिय:॥ ७॥
तत्र सर्वत्र वक्तव्यं मन्यन्ते शास्त्रकोविदा:।
विशेषतश्च वक्तव्यं द्यूते पश्यन्ति तद्विद:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
स्त्री-आसक्ति, जुआ, शिकार का शौक और मद्यपान- ये चार प्रकार के सुख कामनाओं से उत्पन्न होने वाले दुःख कहे गए हैं, जिनके कारण मनुष्य धन और ऐश्वर्य से भ्रष्ट हो जाता है। शास्त्रों के पारंगत विद्वान् इन चारों को सब दशाओं में निन्दनीय मानते हैं; किन्तु जो लोग जुए के दोषों को जानते हैं, वे जुए को विशेष रूप से निन्दनीय मानते हैं। 7-8॥
 
Attachment to women, gambling, hobby of hunting and drinking – these four types of pleasures are said to be the sorrows caused by desires, due to which man gets corrupted by his wealth and opulence. Adept scholars of the scriptures consider these four to be condemnable in all circumstances; But people who know the evils of gambling consider gambling to be especially condemnable. 7-8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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