श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 13: श्रीकृष्णका जूएके दोष बताते हुए पाण्डवोंपर आयी हुई विपत्तिमें अपनी अनुपस्थितिको कारण मानना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.13.5 
वीरसेनसुतो यैस्तु राज्यात् प्रभ्रंशित: पुरा।
अतर्कितविनाशश्च देवनेन विशाम्पते॥ ५॥
 
 
अनुवाद
और जिन दोषों ने पूर्वकाल में वीरसेन के पुत्र महाराज नल को राजसिंहासन से उतार दिया था, हे मनुष्यों के स्वामी! जुआ खेलने से अचानक ऐसा सर्वनाश हो जाता है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती ॥5॥
 
And the faults which in the past had dethroned Maharaaj Nala, son of Veerasena, from the throne. O Lord of men! By gambling suddenly such a total destruction comes about which cannot even be imagined. ॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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