श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 13: श्रीकृष्णका जूएके दोष बताते हुए पाण्डवोंपर आयी हुई विपत्तिमें अपनी अनुपस्थितिको कारण मानना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.13.2 
आगच्छेयमहं द्यूतमनाहूतोऽपि कौरवै:।
आम्बिकेयेन दुर्धर्ष राज्ञा दुर्योधनेन च।
वारयेयमहं द्यूतं बहून् दोषान् प्रदर्शयन्॥ २॥
 
 
अनुवाद
दुर्जय वीर! अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्र, राजा दुर्योधन और अन्य कौरवों के बिना भी मैं उस द्यूतशाला में आ जाता और द्यूतक्रीड़ा के नाना प्रकार के दोष बताकर उसे रोकने का प्रयत्न करता॥ 2॥
 
Durjay Veer! Even without being invited by Ambikanandan Dhritarashtra, King Duryodhana and the other Kauravas, I would have come to that gambling hall and would have tried to stop it by pointing out the various faults of gambling.॥ 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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