|
| |
| |
श्लोक 3.13.17  |
अहो कृच्छ्रमनुप्राप्ता: सर्वे स्म भरतर्षभ।
सोऽहं त्वां व्यसने मग्नं पश्यामि सह सोदरै:॥ १७॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| हे भरतवंशी रत्न! अरे! तुम सब लोग महान संकट में पड़ गए हो। मैं तुम्हें और तुम्हारे सभी भाइयों को दुःख के सागर में डूबते हुए देख रहा हूँ॥ 17॥ |
| |
| O jewel of the Bharat clan! Oh! All of you have fallen into great difficulty. I can see you along with all your brothers drowning in the ocean of misery.॥ 17॥ |
| |
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि वासुदेववाक्ये त्रयोदशोऽध्याय:॥ १३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें वासुदेववाक्यविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३॥
|
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|