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mahabharat 3.129.8: कुरुणानन्द! इस तीर्थ के विषय में कुछ श्लोक हैं, जो परम्परागत कथा कहते हैं, मैं उन्हें सुनाता हूँ, तुम मेरे मुख से सुनो - (प्राचीन काल की कथा है, एक स्त्री अपने पुत्र के साथ इस तीर्थ में रहने आई थी) एक भयंकर राक्षसी ने, जो ओखली के समान आभूषण धारण किए हुए थी, उससे ये श्लोक कहे -॥8॥   |   mahabharat अध्याय 3.129: कुरुक्षेत्रके द्वारभूत प्लक्षप्रस्रवण नामक यमुनातीर्थ एवं सरस्वतीतीर्थकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.129.8 
अत्रानुवंशं पठत: शृणु मे कुरुनन्दन।
उलूखलैराभरणै: पिशाची यदभाषत॥ ८॥
 
 
अनुवाद
कुरुणानन्द! इस तीर्थ के विषय में कुछ श्लोक हैं, जो परम्परागत कथा कहते हैं, मैं उन्हें सुनाता हूँ, तुम मेरे मुख से सुनो - (प्राचीन काल की कथा है, एक स्त्री अपने पुत्र के साथ इस तीर्थ में रहने आई थी) एक भयंकर राक्षसी ने, जो ओखली के समान आभूषण धारण किए हुए थी, उससे ये श्लोक कहे -॥8॥
 
Kuruṇānanda! There are some verses which tell a traditional story about this pilgrimage, which I will recite, you listen from my mouth - (It is a story of ancient times, a woman had come to live in this pilgrimage with her son,) a fierce demoness, who was wearing ornaments like mortar, said these verses to her -॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)