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mahabharat 3.129.19: 'मुनीश्वर! तप के बल से संपन्न होने के कारण आप ही सच्चे योद्धा हैं। आपकी कृपा से ही आज मैं इस प्लक्षवतरण के जल में स्थित होकर समस्त लोकों को स्पष्ट रूप से देख पा रहा हूँ। यहीं से मैं पाण्डवों में श्रेष्ठ श्वेत वाहनधारी अर्जुन को भी देख पा रहा हूँ॥ 19॥   |   mahabharat अध्याय 3.129: कुरुक्षेत्रके द्वारभूत प्लक्षप्रस्रवण नामक यमुनातीर्थ एवं सरस्वतीतीर्थकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 129: कुरुक्षेत्रके द्वारभूत प्लक्षप्रस्रवण नामक यमुनातीर्थ एवं सरस्वतीतीर्थकी महिमा  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  3.129.19 
सर्वाॸल्लोकान् प्रपश्यामि तपसा सत्यविक्रम।
इहस्थ: पाण्डवश्रेष्ठं पश्यामि श्वेतवाहनम्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
'मुनीश्वर! तप के बल से संपन्न होने के कारण आप ही सच्चे योद्धा हैं। आपकी कृपा से ही आज मैं इस प्लक्षवतरण के जल में स्थित होकर समस्त लोकों को स्पष्ट रूप से देख पा रहा हूँ। यहीं से मैं पाण्डवों में श्रेष्ठ श्वेत वाहनधारी अर्जुन को भी देख पा रहा हूँ॥ 19॥
 
‘Muniswar! Being endowed with the power of penance, you are in fact the true warrior. By your grace, today I am able to see all the worlds clearly while being situated in the water of this Plakshavatran. From here itself, I can also see the best of the Pandavas, Arjuna, who had a white vehicle.॥ 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)